Sunday, September 04, 2005

परिचय




शास्त्री नित्यगोपाल कटारे
जन्म : २६ मार्च १९५५ ई०
(चैत्र शुक्ल तृतीया संवत २०१२)
जन्म स्थान : ग्राम टेकापार (गाडरवारा) जि० नरसिंहपुर (म.प्र.)
आत्मज : स्व० श्री रामचरण लाल कटारे
शिक्षा : वाराणसेय संस्कृत विश्व विद्यालय वाराणसी से व्याकरण 'शास्त्री` उपाधि; संस्कृत भूषण; संगीत विशारद।
प्रकाशन : विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में व्यंग्य लेख, कविता, नाटक आदि का हिन्दी एवं संस्कृत भाषा में अनवरत प्रकाशन।
प्रसारण : आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के विभिन्न केन्द्रों से संस्कृत एवं हिन्दी कविताओं का प्रसारण।
कृतियाँ : पञ्चगव्यम् (संस्कृत कविता संग्रह)
विपन्नबुद्धि उवाच (हिन्दी कविता संग्रह)
नेता महाभारतम् (संस्कृत व्यंग्य काव्य)
नालायक होने का सुख ( व्यंग्य संग्रह )
विशेष : हिन्दी एवं संस्कृत भाषा के अनेक स्तरीय साहित्यिक कार्यक्रमों का संचालन एवं काव्य पाठ । पन्द्रह साहित्यिक पुस्तकों का संपादन।

सम्प्रति : अध्यापन; महासचिव शिव संकल्प साहित्य परिषद्, नर्मदापुरम् एवं मार्गदर्शक 'प्रखर` साहित्य संगीत संस्था भोपाल।

संपर्क : ई०डब्ल्यू एस०-६०
हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी
होशंगाबाद पिन-४६१००(म०प्र०)
दूरभाष- 07574-257338
e-mail- katare_nityagopal@yahoo.co.in



Friday, April 15, 2005

विविध लिंक

* आओ सीखें संस्कृत भाषा

* अनुभूति पर हिन्दी के १०० सर्वश्रेष्ठ गीतों में सम्मिलित।

* शास्त्री नित्यगोपाल कटारे विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रमों में

नालायक होने का सुख का लोकार्पण

मुक्तक

हिंसा

हिंसा ही यदि लक्ष्य हो गया जिस मानव का
पाठ अहिंसा का क्या कभी समझ पाएगा
कर हिंसा स्वीकार अहिंसा व्रत का पालन
हिंसा का ही तो परिपोषण कहलाएगा।

***

हिंसा की पीड़ा का अनुभव जिसे नहीं है
वही व्यक्ति तो खुलकर हिंसा कर पाता है
हिंसक मूढ, अहिंसा की भाषा क्या जाने
अपनी ही भाषा में व्यक्ति समझ पाता है।

***


नहीं करूँगा हिंसा और न होने दूँगा
ऍसा सच्चा अहिंसार्थ व्रत लेना होगा
हिंसा के जरिए यदि हिंसा कम होती है
व्यापक अर्थ अहिंसा का अब लेना होगा।

***


युद्ध

सत्य अहिंसा और शान्ति की रक्षा करने
अगर युद्ध भी होता है तो हो जाने दो
मातृभूमि की मर्यादा की रक्षा में यदि
अपना सब कुछ खोता है तो खो जाने दो
नहीं करेंगे इस पर कोई भी समझौता
महाप्रलय भी होता है तो हो जाने दो।

***


डर

दुनिया में जो कौम मौत से डर जाती है
सपने में भी वह सम्मान नहीं पाती है
दीन–हीन श्रीहीन दरिद्र निकम्मी बनकर
अपमानित होकर जीते जी मर जाती है।

***


शान्ति प्रस्ताव


शान्ति भंग करने की जिद जिसने ठानी है
उसे शान्ति– प्रस्ताव सरासर बेमानी है
लातों के देवता बात से नहीं मानते
भय बिन होय न प्रीति नीति हमने जानी है।
***

-शास्त्री नित्यगोपाल कटारे

आओ अब विचार करें

आओ अब विचार करें
सामने रखें दर्पण
सत्य को स्वीकार करें
गवाँ चुके काफी समय
और न गँवायें अब
उलझी हुई समस्या को
और न उलझाएँ अब
मिल जुलकर बैठें सभी
खुद पर उपकार करें
आओ अब विचार करें।
सड़ते हुए घावोँ को
कब तक ढक पाएँगे
गोलियों से कब तक अपना
दर्द हम भुलाएँगे
साहस से खोलें और
खुद से उपचार करेँ
आओ अब विचार करें।
जाति भेद वर्ग भेद
धर्म भेद त्यागेँ अब
कूप मण्डूकता की
निद्रा से जागें हम
आदमी है‚ आदमी से
आदमी सा प्यार करें
आओ अब विचार करें।
शकनु के षड्यन्त्रोँ मे
दुर्योधन व्यस्त है
बुद्धिजीवी भीष्म सारे
जाने क्यों तटस्थ हौँ
न्याय का समर्थन
अन्याय का प्रतिकार करें
आओ अब विचार करें।
भारत की वैज्ञानिक
सुपरष्किृत भाषाएँ
हतप्रभ कुपुत्रोँ की
सुनकर परिभाषाएँ
अँग्रेजी छोड़े
मातृ भाषा से प्यार करें
आओ अब विचार करें।
सारे मुखपृष्ठों पर
गुण्डों के भाषण हैँ
कुण्ठित प्रतिभावों पर
तम का अनुशासन है
तथ्यों को समझें
भ्रम का बह्ष्किार करें।।
आओ अब विचार करें।

॥ नित्यगोपाल कटारे ॥

Monday, April 11, 2005

संस्कृत लोकगीत


प्रथमपतिगृहानुभवम्

हे सखि पतिगृहगमनं
प्रथमसुखदमपि किंत्वतिक्लिष्टं री।
परितो नूतन वातावरणे
वासम् कार्यविशिष्टं री।।
वदने सति अवरुद्धति कण्ठं
दिवसे अवगुण्ठनमाकण्ठं।
केवलमार्य त्यक्त्वा तत्र
किंञ्चिदपि मया न दृष्टं री।।
वंश पुरातन प्रथानुसरणं
नित्यं मर्यादितमाचरणं।
परिजन सकल भिन्न निर्देश पालने
प्रभवति कष्टं री।।
भर्तुर्पितरौ भगिनी भ्राता
खलु प्रत्येकः क्लेश विधाता।
सहसा प्रियतममुखं विलोक्य तु
सर्वं कष्ट विनिष्टं री।।
अभवत् कठिनं दिवावसानम्
बहु प्रतीक्षितं रजन्यागमनम्।
लज्जया किञ्च कथं कथयानि
विशिष्ट प्रणयपरिशिष्टं री।।

:: नित्यगोपाल कटारे ::



संस्कृत लोकगीत

सौन्दर्यँ दशर्नम्

वैभवं कामये न धनं कामये
केवलं कामिनी दर्शनं कामये
सृष्टि कार्येण तुष्टोस्म्यहं यद्यपि
चापि सौन्दर्य संवर्धनं कामये।
रेलयाने स्थिता उच्च शयनासने
मुक्त केशांगना अस्त व्यस्तासने
शोभिता तत्र सर्वांग आन्दोलिता
अनवरत यान परिचालनं कामये।
सैव मिलिता सड़क परिवहन वाहने
पंक्ति बद्धाः वयं यात्रि संमर्दने
मम समक्षे स्थिता श्रोणि वक्षोन्नता
अप्रयासांग स्पर्शनं कामये।
सैव दृष्टा मया अद्य नद्यास्तटे
सा जलान्निर्गता भाति क्लेदित पटे
दृशयते यादृशा शाटिकालिंगिता
तादृशम् एव आलिंगनं कामये।
एकदा मध्य नगरे स्थिते उपवने
अर्धकेशामपश्यम् लता मण्डपे
आंग्ल शवानेन सह खेलयन्ती तदा
अहमपि श्वानवत् क्रीडनं कामये।
नित्य पश्याम्यहं हाटके परिभ्रमन्
तां लिपिष्टकाधरोष्ठी कटाक्ष चालयन्
अतिमनोहारिणीं मारुति गामिनीम्
अंग प्रत्यंग आघातनं कामये।
स्कूटी यानेन गच्छति स्वकार्यालयं
अस्ति मार्गे वृहद् गत्यवरोधकम्
दृश्यते कूर्दयन् वक्ष पक्षी द्वयं
पथिषु सर्वत्र अवरोधकम् कामये।

: शास्त्री नित्यगोपाल कटारे :